- - - - - - - - -मसूर ( Lentil )- - - - - - - - -
भूमि (soil) :- मसूूूर की खेती के लिए दोमट एवं बलुुई भूमियां अच्छी होती हैं । इसकी खेेेेती के लिए अच्छी जल निकास वाली बलुई दोमट भूमियां जिमका pH मान 7.0 हो अच्छी होती हैैैं।
मसूर की उन्नतशील प्रजातियाँ (Verities) :-
JL-3 :- यह उखटा रोधी किस्म है तथा 112 - 118 दिनों में पककर तैयार हो जाती है एवं 11 - 14 क्विंटल प्रति हेक्टेेेेयर उपज होती है।
मल्लिका:- यह रतुआ तथा उखटा रोधी किस्म हैै तथा 115-120 दिनों मेंं पककर तैयार हो जाती है एवं 11 - 14 क्विंटल प्रति हेक्टेेेेयर उपज होती है।
बीज दर(Seed Rate):- मसूर का बीज दर दानों के आकार , बुवाई की विधि, बुवाई के समय मृदा की किस्म एवं मृदा की उर्वरा शक्ति पर निर्भर करती है ,मध्यम आकार के बीज की प्रजाति का 30-35 किलो बीज प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। देरी से बुआई करने वालेेेेेे किसान भाइयों को 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की बुवाई करनी चाहिए ।
बीज उपचार(Seed Treatment):- बीजो को बुवाई से पहले थीरम या वाविस्टन 2.5 ग्राम सेे प्रति किलो बीज को उपचारित करें ।इसके पश्चात बीजों को 5 ग्राम राइजोबियम कल्चर एवं 5 ग्राम पी.एस.वी. कल्चर से उपचारित कर बुवाई करें।
बुआई का समय(Sowing Time):- शुष्क अवस्था में मसूर को अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह स नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक तथा सिंचित अवस्था में नवम्बर के प्रथम सप्ताह से अंतिम सप्ताह तक बुआई करें ।
बुआई की विधि(Sowing Method's) :- मसूर की बुवाई देशी नाड़ी या सीडड्रिल से की जानी चाहिए तथा बुआई करते समय कतार से कतार 30 सेमी. रखनी चाहिए । बीजों को 5-6 सेमी. की गहराई पर ही बुवाई करें।
खाद एवं उर्वरक (Manure & Fertilizers):- मृदा की उर्वरता एवं उत्पादन के लिए उपलब्ध होने पर 15 टन अच्छी सड़ी गोबर की खाद व 20 किलोग्राम नत्रजन तथा 50 किलोग्राम फास्फोरस एवं 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए ।
निराई - गुड़ाई (Interculture):- खरपतवार नियंत्रण हेतु बुवाई के 15-25 दिन बाद क्यूजेलोफाव 700 मि.ली. / हे. रासायनिक दवा 400-500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें ।
सिंचाई(Irrigation):- मसूर में पहली सिंचाई 30-35 दिनों के बाद अर्थात् शाखा निकलते समय करें । दूसरी सिंचाई आवश्यकतानुसार बुवाई के 70-75 दिनों के बाद करें।
रोग एवं कीट नियंत्रण :-
प्रमुख रोग(Disease):-
उखटा :- यह मसूर कर प्रमुख रोग है इससे फसल की 25- 50 % तह हानि हो जाती है । इसके उपचार के लिए उखटा रोग रोधी किस्मों का प्रयोग करना चाहिए एवं जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किग्रा. बीज या बैसीलस 6 ग्राम / किग्रा. बीज दर से उपचारित करना चाहिए ।
गेरुआ:- इसमें कभी - कभी गेरुआ रोग की प्रभाव देखा गया है इसके नियंत्रण के लिए मेनकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर खड़ी फसल पर छिड़काव करें।
प्रमुख कीट(Insects) :-
काला माहूँ :- मसूर में सबसे अधिक नुकसान माहूँ के द्वारा होता है इसलिए नियंत्रण के लिए डायमेथोएट 30 ई.सी 500 मिली. या फास्फोमिडान 50 ई.सी 250 मिली. को 500 - 600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें यह छिडकाव शुरुआती अवस्था में करना चाहिए ।
कली भेदक :- मसूर का फली भेदक कीट सबसे अधिक नुकसान करता है । इसकी रोकथाम के लिए क्लोरोपाइरीफास 0.04 % , या प्रोफेनफास 0.04 % , अथवा मेलाथियान धूल 25 किग्रा. / हे. की दर से पहला छिड़काव फूल बनते समय या फली बनने की प्रारम्भिक अवस्था में करनी चाहिए ।
कटाई(Harvesting):- फसल पकने पर ज्यादा सूखने से पूर्व फसल की कटाई करके साफ खलिहान में सुखाकर गहाई करें ।
भण्डारण (Storage):- 9 - 11 प्रतिशत नमी रहने तक सुखा कर भण्डारण करें ।
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